ब्यूरो रिपोर्ट- सुनील कुमार
महराजगंज : "बेटा विदेश चला गया, 1 लाख भेजता है" - ये एक लाइन आज भारत के हर छोटे-बड़े कस्बे में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली लाइन बन गई है। माँ-बाप गर्व से कहते हैं, पड़ोसी सुनकर आंखें फाड़ लेते हैं। लेकिन इस एक लाइन के पीछे कितने घर बिके, कितनी जमीन गिरवी रखी गई, कितने बेटे पासपोर्ट छिनने के बाद विदेश की जेलों में सड़ रहे हैं, ये कोई नहीं बताता। कारण बहुत सीधा है। हमारे स्कूल और कॉलेज बच्चों को कैलकुलस, कोडिंग, अकाउंटिंग, GST सब सिखा देते हैं। लेकिन जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला, यानी "विदेश कैसे सुरक्षित जाएं", इस पर एक पीरियड भी नहीं लगता। नतीजा ये है कि हर साल हजारों युवा एजेंटों के झूठे वादों में आकर तस्करी, बंधुआ मजदूरी और धोखे का शिकार बन रहे हैं। विदेश मंत्रालय और संसद में पिछले तीन सत्रों में दिए गए आंकड़े डराने वाले हैं। 2023 से 2025 के बीच सिर्फ खाड़ी देशों, कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैंड और यूरोप के "डंकी रूट" से जुड़े मामलों में भारतीय दूतावासों में 15,000 से ज्यादा शिकायतें दर्ज की गईं। इनमें से 62 प्रतिशत मामले ऐसे थे जहां युवा को टूरिस्ट या विजिट वीजा पर भेजकर वहां अवैध रूप से काम करवाया गया। इन पीड़ितों में 70 प्रतिशत 18 से 30 साल की उम्र के ग्रेजुएट, डिप्लोमा होल्डर या ITI पास युवा थे। सबसे ज्यादा मामले पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से आए। एक अनुमान के अनुसार "फ्री जॉब", "2 महीने में कनाडा", "दुबई में 1.5 लाख सैलरी" के नाम पर चलने वाला ये अवैध नेटवर्क हर साल 8 से 10 हजार करोड़ रुपये का कारोबार करता है। ये सिर्फ पैसों का खेल नहीं है। ये सपनों, कर्ज और जिंदगियों का सौदा है। अब सवाल उठता है कि ये सब हो क्यों रहा है। क्या युवा आलसी हैं? नहीं। क्या परिवार लालची हैं? नहीं। असल समस्या जानकारी की कमी है। एक 19 साल का लड़का जो http://B.Com कर रहा है, उसे ये नहीं पता कि वर्क वीजा और टूरिस्ट वीजा में क्या फर्क है। उसे नहीं पता कि भारत सरकार का eMigrate पोर्टल क्या है और POE यानी Protector of Emigrants से रजिस्टर्ड एजेंट की लिस्ट कहां मिलती है। उसे ये नहीं बताया गया कि अगर कोई एजेंट कहे "पहले 10 लाख दो, वीजा पक्का है" तो वो 100 प्रतिशत फ्रॉड है। उसे ये नहीं पता कि विदेश में मुसीबत आने पर 1800-11-3090 हेल्पलाइन या नजदीकी भारतीय दूतावास से कैसे संपर्क करना है। हम स्कूल में सड़क पार करना, साइबर फ्रॉड से बचना, गुड टच बैड टच सब सिखाते हैं। लेकिन दुनिया के सबसे बड़े श्रम निर्यातक देश का नागरिक बनने की शिक्षा नहीं देते। कॉलेज की स्थिति और भी गंभीर है। प्लेसमेंट सेल कंपनियां लाता है, पर उन कंपनियों की विदेश में वैधता कौन चेक करेगा ये कोई नहीं बताता। करियर काउंसलिंग में "अमेरिका में MS करो" या "कनाडा में PR लो" की बात होती है, पर उसके लिए जरूरी IELTS स्कोर, स्किल सर्टिफिकेट, बैंक बैलेंस और कानूनी प्रक्रिया कौन समझाएगा। इसी खालीपन को एजेंट भरते हैं। वो Instagram, Facebook, WhatsApp पर "No IELTS, No Experience, 15 Days में जर्मनी" जैसे विज्ञापन चलाते हैं। युवा फॉर्म भरता है, इंटरव्यू होता है, फर्जी ऑफर लेटर आता है और 3 महीने बाद वो लड़का कंबोडिया के किसी साइबर फ्रॉड सेंटर में 16 घंटे कंप्यूटर पर बैठा मिलता है। पासपोर्ट जमा, मारपीट, और टारगेट पूरा न करने पर बिजली के झटके। 2024 में म्यांमार और कंबोडिया से 500 से ज्यादा भारतीय युवाओं को विदेश मंत्रालय और सेना की मदद से छुड़ाया गया। इनमें से अधिकांश ने कहा "सर हमें लगा था IT की नौकरी है"। इसलिए अब वक्त आ गया है कि हम प्रवासन को टैबू की तरह न देखें। युवा विदेश जाएंगे, ये तय है। भारत दुनिया को सबसे ज्यादा रेमिटेंस भेजने वाला देश है। 2024 में ही 120 बिलियन डॉलर से ज्यादा विदेश से भारत आया। ये देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। लेकिन ये रेमिटेंस सम्मान से कमाया जाए, जान जोखिम में डालकर नहीं। इसके लिए समाधान सिर्फ पुलिस और कानून नहीं है। समाधान कक्षा से शुरू होगा।
स्कूल स्तर पर कक्षा 9 से 12 तक "सुरक्षित प्रवासन" का एक बेसिक मॉड्यूल जोड़ा जाना चाहिए। ये 8-10 पीरियड का मॉड्यूल होगा। इसमें बच्चों को बताया जाए कि विदेश में नौकरी के प्रकार क्या होते हैं, वीजा के प्रकार क्या होते हैं। उन्हें सिखाया जाए कि किसी भी विदेश जॉब के लिए एजेंट का लाइसेंस नंबर मांगना जरूरी है और उसे http://www.emigrate.gov.in पर चेक करना है। उन्हें फर्जी ईमेल, फर्जी कंपनी वेबसाइट, और "पैसे पहले" वाले ऑफर की पहचान सिखाई जाए। उन्हें ये भी बताया जाए कि अगर दोस्त या रिश्तेदार विदेश से "जल्दी आ जाओ, काम पक्का है" कहे तो भी पहले दूतावास से वेरिफाई करना जरूरी है। साथ में गुड टच बैड टच की तरह "सुरक्षित प्रवासन के 5 नियम" का पोस्टर हर क्लास में लगे। कॉलेज स्तर पर इसे और गंभीरता से लेना होगा। UGC को निर्देश देना चाहिए कि हर डिग्री और डिप्लोमा कोर्स के साथ "Safe and Legal Migration" नाम का 2 क्रेडिट का अनिवार्य पेपर हो। ये पेपर थ्योरी और प्रैक्टिकल दोनों हो। थ्योरी में अंतरराष्ट्रीय श्रम कानून, गंतव्य देशों के नियम, वित्तीय साक्षरता, लोन और स्कॉलरशिप के विकल्प पढ़ाए जाएं। प्रैक्टिकल में छात्रों से कहा जाए कि वो किसी एक देश की कंपनी को चुनें और उसके वर्क परमिट की प्रक्रिया खुद रिसर्च करके प्रेजेंटेशन दें। प्लेसमेंट ऑफिसर की ट्रेनिंग में विदेश मंत्रालय के अधिकारी शामिल हों। हर कॉलेज में "Career and Safe Migration Cell" बने जिसका काम सिर्फ प्लेसमेंट नहीं, बल्कि छात्रों को धोखे से बचाना भी हो। हर 6 महीने में दूतावास, NGO और पुलिस मिलकर कैंपस में वर्कशॉप करें जहां लौटकर आए पीड़ित अपनी कहानी सुनाएं। इस पाठ्यक्रम में 4 चीजें जरूर होनी चाहिए। पहला कानूनी साक्षरता। छात्र को पता होना चाहिए कि टूरिस्ट वीजा पर काम करना गैरकानूनी है, पासपोर्ट किसी को गिरवी नहीं रखा जा सकता, और विदेश में कम से कम मजदूरी कितनी है। दूसरा वित्तीय जागरूकता। 15 लाख एजेंट को देने के बजाय बैंक से एजुकेशन लोन, स्किल इंडिया के प्रोग्राम, और सरकारी स्कॉलरशिप कैसे मिलती है। तीसरा भाषा और स्किल। IELTS, PTE, जर्मन, जापानी भाषा और टेक्निकल स्किल के बिना विदेश में आप सिर्फ सस्ता मजदूर बनेंगे। चौथा असली कहानियां। किताबी ज्ञान से डर नहीं लगता। जब छात्र सुनेंगे कि कैसे एक इंजीनियरिंग का लड़का "कॉल सेंटर जॉब" के नाम पर लाओस ले जाया गया और 8 महीने तक ऑनलाइन ठगी करवाई गई, तब उन्हें समझ आएगी। अब कोई कहेगा कि सिलेबस पहले ही बहुत भारी है, टीचर पहले ही कम हैं, ये नया बोझ क्यों। इसका जवाब ये है कि क्या एक क्रेडिट कोर्स एक जिंदगी से भारी है। क्या एक पीरियड एक परिवार को कर्ज और शर्म से नहीं बचा सकता। हमने कोरोना के बाद सिलेबस में डिजिटल साक्षरता जोड़ी, साइबर सुरक्षा जोड़ी। तो प्रवासन सुरक्षा क्यों नहीं जोड़ सकते। इसके लिए नया टीचर रखने की जरूरत नहीं है। सामाजिक विज्ञान, वाणिज्य और कानून के प्रोफेसरों को 15 दिन की ट्रेनिंग देकर ये काम करवाया जा सकता है। खर्च भी बहुत नहीं है। विदेश मंत्रालय, IOM और कई NGO इस काम के लिए फंड और ट्रेनर देने को तैयार हैं। इसके साथ सरकार को 3 काम और करने होंगे। पहला, POE से अप्रूव्ड एजेंटों की लिस्ट को हर स्कूल-कॉलेज की वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर लगाना अनिवार्य हो। दूसरा, सोशल मीडिया कंपनियों को जिम्मेदार ठहराया जाए। Facebook और Instagram पर "विदेश जॉब" का विज्ञापन तभी चले जब उसमें POE नंबर हो। तीसरा, लौटकर आए पीड़ितों के लिए पुनर्वास। उन्हें अपराधी की तरह न देखा जाए। उन्हें स्किल देकर दोबारा खड़ा किया जाए ताकि वो दूसरों को जागरूक कर सकें। अंत में ये समझना जरूरी है कि हम प्रवासन रोकना नहीं चाहते। भारत का युवा दुनिया में झंडा गाड़े, ये हमारी ताकत है। NASA में, Google में, दुबई में, जर्मनी की फैक्ट्रियों में भारतीयों का नाम है। लेकिन फर्क इस बात का है कि वो सम्मान से गए या मजबूरी में फंसे। एक तरफ वो युवा हैं जो स्कॉलरशिप लेकर MIT गए। दूसरी तरफ वो युवा हैं जो 12 लाख देकर कंबोडिया में साइबर गुलाम बने। दोनों में फर्क सिर्फ जानकारी का है। इसलिए सरकार "कौशल भारत" के साथ "सुरक्षित भारत" को भी जोड़े। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के साथ "प्रधानमंत्री सुरक्षित प्रवासन योजना" भी चले। हर जिले में एक हेल्प डेस्क हो जहां माता-पिता जाकर पूछ सकें कि ये एजेंट सही है या नहीं। कॉलेज सिर्फ डिग्री नहीं देता। वो जिंदगी के लिए तैयार करता है। और आज की जिंदगी में सबसे जरूरी स्किल है - सुरक्षित निर्णय लेना। अगर हमने आज स्कूल और कॉलेज में प्रवासन की शिक्षा शुरू कर दी, तो 5 साल बाद हमारे आंकड़े बदल जाएंगे। दूतावासों में शिकायतें कम होंगी, कर्ज के मामले कम होंगे, और भारत का नाम "कुशल और सुरक्षित" कामगारों के देश के रूप में होगा। क्योंकि अंत में बात बहुत छोटी है। सपना देखना गलत नहीं है। गलत है आंख बंद करके सपनों के पीछे भागना। एक घंटे की क्लास, एक सही जानकारी, एक जागरूक छात्र - ये तीनों मिलकर तस्करों के दस जाल तोड़ सकते हैं। और यही समय की मांग है। "डिग्री के साथ सुरक्षा भी जरूरी है। सपना विदेश का हो, पर रास्ता कानून का हो"
No comments:
Post a Comment